सती प्रथा

सती प्रथा | मृत पति के साथ उसकी पत्नी स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से जीवित जल जाती थी, इस प्रक्रिया को ‘सहगमन’ कहा गया। ऐसी प्रथाएँ समाज के लिए कलंक थी

सती प्रथा

मृत पति के साथ उसकी पत्नी स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से जीवित जल जाती थी, इस प्रक्रिया को ‘सहगमन’ कहा गया। शिलालेखों तथा काव्य ग्रंथों में अपने पति में पूर्ण निष्ठा व भक्ति रखने वाली पत्नी के लिए भी ‘सतो’ शब्द का प्रयोग किया गया।

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घटियाला अभिलेख (810 ई.) से प्रमाणित होता है कि राजपूत सामंत राणुक की पत्नी संपलदेवी ने सहगमन किया। मुगल सम्राट अकबर ने सती होने पर रोक लगाने के प्रयास किये, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। 20वीं शताब्दी में 1987 ई. में दिवराला (सीकर) में रूपकुंवर का सती होना वर्तमान समय में भी इस जघन्य प्रथा के लिए लोगों की भावना को प्रकट करता है।

ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय सती प्रथा के विरुद्ध समाज को जागरूक किया. जिसके फलस्वरूप इस आन्दोलन को बल मिला और तत्कालीन अंग्रेज सरकार को इस प्रथा को रोकने के लिए कानून बनाने के लिए विवश होना पड़ा. अंततः उन्होंने 1829 ई. में सती होने को रोकने का क़ानून पारित किया और इसी प्रकार भारत में सती होने पर रोक लगे गई थी.

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सती प्रथा FAQ

Q 1. ‘सहगमन’ किसे कहा गया है?

Ans – मृत पति के साथ उसकी पत्नी स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से जीवित जल जाती थी, इस प्रक्रिया को ‘सहगमन’ कहा गया है. 

Q 2. भारत में सती होने पर रोक कब व किसने लगाई थी?

Ans – भारत में सती होने पर पर रोक 1829 ई. को राजा राममोहन राय ने लगाई थी.

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