कछवाहों का शक्ति विस्तार और मुगलों से संबंध

कछवाहों का शक्ति विस्तार और मुगलों से संबंध | उत्तरी राजस्थान में चौहान शक्तिशाली बनते जा रहे थे, कच्छवाहों को कुछ समय उनके सामन्त के रूप में रहना पड़ा हो

कछवाहों का शक्ति विस्तार और मुगलों से संबंध

उत्तरी राजस्थान में चौहान शक्तिशाली बनते जा रहे थे, कच्छवाहों को कुछ समय उनके सामन्त के रूप में रहना पड़ा हो। पंचमदेव (पजोनजी) को पृथ्वीराज चौहान का समकालीन सामन्त माना है, जो पृथ्वीराज का महोबा युद्ध में सहयोगी था और तराइन के युद्ध में लड़कर वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी वंश का पंचवनदेव बड़ा शक्तिशाली शासक था। उसकी मृत्यु के बाद बँढाई पर, ख्याति के अनुसार क्रमश: मालसी, जिलदेव, रामदेव, किल्हण, कुन्तल जणशी, उदयकरण, नरसिंह, उदरण व चन्द्रसेन ने शासन किया। इसी वंश का शासक पृथ्वीराज मेवाड़ के महाराणा सांगा का सामन्त था जो खानवा के युद्ध में सांगा की तरफ से लड़ा था। पृथ्वीराज गलता के रामानुज संप्रदाय के संत कृष्णदास पयहारी के अनुयायी थे।

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टॉड राजस्थान‘ में लिखा है कि मलैसीजी और पृथ्वीराज के बीच के समय में राज्य में बखेडे हो रहे थे। महाराज पृथ्वीराज ने उनको शांत किया और अपने राज्य को 12 भागों में विभाजित करके अपने 12 पुत्रों को दे दिया जिसकी ’12 कोटड़ी’ प्रसिद्ध हुई। उल्लेखनीय है कि राणा सांगा मेवाड़ के राणा बनने से पहले भाईयों के डर से अज्ञातवास करने के लिए आमेर के पृथ्वीराज के पास छदम् वेश में चाकर नकर रह रहे थे। पृथ्वीराज (1502 में राज्यारोहण) और उसका पुत्र जगमल व उनके अनेक संबंधी मार्च 17, 1527 को मेवाड़ की ओर से बाबर के विरुद्ध खानवा के युद्ध में लड़े। कुछ महीने बाद (नवंबर) पृथ्वीराज की मृत्यु हो गई। जबकि कर्नल टॉड ने पृथ्वीराज की हत्या उसके बड़े पुत्र भीम के द्वारा बताई है।

पृथ्वीराज के 9 रानियां और 19 पुत्र थे। इनमें भीमसिंह सबसे बड़े पुत्र थे तथा 18वें पुत्र पूरणमलजी थे। ‘अपूर्वदेवी’ बालाबाई (राडौड़जी) रावलूणकरण बीकानेर की पुत्री थी यह ‘आमेर की मीरां बाई’ कहलाती है। इन्हीं के पुत्र सांगा ने सांगानेर कस्बा बसाया। संवत् 1584 में महाराजा पृथ्वीराज की मृत्यु होने के पीछे उनके 18वें पुत्र ‘पूरणमल’, पहले पुत्र भींवजी (भीम) और तीसरे पुत्र भारमल यथाक्रम आमेर के राजा हुए। इस समय दिल्ली में मुगल सम्राट हुमायूं था। नियमानुसार पूरणमल बादशाह की सेवा में गया और ‘राजा’ का खिताब तथा ‘माही मरातब” प्राप्त किया। पूरणमल आमेर का पहला राजा था जो दिल्ली के बादशाह के दरबार में गया था। पूरणमल के दो रानी थी- एक प्रतापदे और दूसरी चौहाणजी। पूरणमल के बड़े पुत्र सूजाजी प्रतापदे राठौड़जी के पुत्र थे।

कछवाहों का शक्ति विस्तार और मुगलों से संबंध
कछवाहों का शक्ति विस्तार और मुगलों से संबंध
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ढूंढाड़ की राजनीतिक स्थिति:

पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद उसका छोटा लड़का पूर्णमल आमेर का शासक बना। ऐसा कराने में उसकी माता बालाबाई, जो बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री थी, का हाथ था। इस घटना से पृथ्वीराज का ज्येष्ठ पुत्र भीमदेव बड़ा रुष्ठ हुआ और उसने पूर्णमल को हराकर 1533 ई. में आमेर की राजगद्दी प्राप्त कर ली। यहाँ से आमेर राज्य में गृह कलह का सूत्रपात हुआ।

भीमदेव की 1536 ई. में मृत्यु हो जाने पर उसका लड़का रत्नसिंह आमेर का शासक बना। उसे शेरशाह की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। उसी के समय में उसके चाचा साँगा ने राव जैतसी की सहायता से आमेर के निकट मोजमाबाद तथा उसके आसपास की भूमि पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और अपने नाम से साँगानेर बसाया। सांगा की मृत्यु के बाद उसके छोटे भाई भारमल ने रत्नसिंह से वैमनस्य रखना आरम्भ किया। उसने कई सामन्तों और रत्नसिंह के छोटे भाई आसकरण को अपने पक्ष में कर लिया। उसने आसकरण को शासक घोषित करने के लिए संगठन कर लिया। परन्तु थोड़े ही समय में भारमल ने सामन्तों को अपनी ओर मिलाकर आसकरण को पदच्युत कर दिया और जून 1547 में वह स्वयं आमेर का शासक बन बैठा।

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कछवाहों का शक्ति विस्तार और मुगलों से संबंध FAQ

Q 1. पंचमदेव (पजोनजी) को किस चौहान का समकालीन सामन्त माना है?

Ans – पंचमदेव (पजोनजी) को पृथ्वीराज चौहान का समकालीन सामन्त माना है.

Q 2. आमेर की मीरां बाई’ कौन है?

Ans – ‘अपूर्वदेवी’ बालाबाई (राडौड़जी) रावलूणकरण बीकानेर की पुत्री ‘आमेर की मीरां बाई’ कहलाती है.

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