शोक की रस्में

शोक की रस्में | भारत में शोक के समय अथवा किसी की मृत्यु हो जाने पर कई रीती-रिवाज प्रचलित है. हम इस अध्याय में कई रीती-रिवाजों के बारें में अध्ययन करेंगे

शोक की रस्में

बैकुण्ठी : मृत्यु हो जाने पर श्मशान घाट लकड़ी की शैया पर मृत व्यक्ति को ले जाया जाता है जिसे बैकुण्ठी कहा जाता है। अग्नि की आहूति सबसे बड़ा बेटा अथवा निकट के भाई द्वारा दी जाती है जिसे ‘लौपा’ कहते हैं।

बखेर अथवा उछाल : किसी सम्पन्न व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उस की बैकुण्ठी ले जाते समय रास्ते में कलश के आगे कोड़िया, रुपये, पैसे आदि लुटाये या उछाले जाते हैं। इस रस्म को बखेर कहते हैं।

आधेटा घर और श्मशान तक की यात्रा के बीच में चौराहे पर वैकुण्ठी का दिशा परिवर्तन किया जाता है। यह क्रिया आधेटा या आधेरा कहलाती है। बैकुण्ठी को ले जाने वाले व्यक्ति निकट सम्बन्धी या परिवार वाले कांधियाँ कहलाते हैं।

सांतरवाड़ा : अंतिम संस्कार होने के उपरान्त अन्तेष्टि में गये व्यक्ति स्नान आदि कर मृत व्यक्ति के घर जाते हैं। आगन्तक व्यक्ति उसे व परिवार के लोगों को धैर्य बंधाकर सान्त्वना देते हैं। इन सभी रस्मों को सातरवाड़ा कहा जाता है।

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फूल एकत्र करना या फूल चुनना : दाह संस्कार के तीसरे दिन मृतक के संबंधी श्मशान जाकर उसके दांत या हड्डियों एकत्रित कर या चुन कर एक थैली या कुल्लड़ में लाते हैं।

शोक की रस्में
शोक की रस्में

तीया: मृत्यु के तीसरे दिन उठावे की बैठक या तीये की बैठक की जाती है जब मित्रगण, परिवार के लोग, रिश्तेदार आकर सान्त्वना देते हैं।

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पगड़ी मोसर के दिन ही मृत व्यक्ति के बड़े पुत्र को उसके उत्तराधिकारी के रूप में पगड़ी बांधी जाती है।

श्राद्ध आश्विन के माह में जिस तिथि को जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई थी उसी दिन किया जाता है। इस दिन ब्राह्मण को, मृतक के निकटतम संबंधी, गाय, कन्या, कौओं को भोजन करवाया जाता है।

नुक्ता (मृत्युभोज)/मोसर मृत्यु के ग्यारहवें बारहवें या तेरहवें दिन मृतक के परिवारजन अपनी जाति के लोगों एवं सम्बन्धियों को भोजन करवाते हैं, जिसे ‘नुक्ता’ या ‘मोसर’ कहते हैं। कुछ व्यक्ति जीवितावस्था में ही मोसर कर जाते हैं, उसे ‘जोसर’ कहा जाता है।

ओख त्यौहार के अवसर पर किसी की मृत्यु होने पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस त्यौहार को नहीं मनाना।

दोवणियां मृतक के 12वें घर की शुद्धि हेतु जल से भरे जाने वाले मटके।

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