मध्यकालीन राजस्व प्रशासन

मध्यकालीन राजस्व प्रशासन | मध्यकाल में राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मूलाधार कृषि एवं कृषि राजस्व ही था। इस समय राजा भूमि का मालिक था

मध्यकालीन राजस्व प्रशासन

मध्यकाल में राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मूलाधार कृषि एवं कृषि राजस्व ही था। इस समय राजा भूमि का मालिक था इसीलिए वह भूमिपति कहलाता था। उसे भूमि को देने और जब्त करने का अधिकार था। किसान वास्तव में खेती की भूमि, जो वंशानुक्रम से चली आती थी, उसे अपनी निजी समझते थे।

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राजस्थान में भूमि के स्वामित्व के विचार से चार वर्गों में विभाजन किया जा सकता है खालसा, जागीर, भोम और शासन। ‘खालसा भूमि राज्य के सीधे स्वामित्व में रहती थी। जिसमें लगान निर्धारण करने, वसूली और लगान में छूट करने का काम सीधा राज्य के अधिकारी करते थे। ‘जागीर’ वह भूमि थी जो राज्य की ओर से सैनिक सेवा या अन्य सेवाओं के उपलक्ष्य में सामन्तों या कर्मचारियों को दी जाती थी।

ऐसी भूमि को बदलना या बेचना बिना राज्य की आज्ञा के सम्भव नहीं था। ‘भोम’ ऐसी जागीर थी जिस पर कोई लगान नहीं था, परन्तु भोमियों से सरकारी सहायता के लिए सेवाएँ अवश्य ली जाती थी। ‘शासन’ भूमि पुण्यार्थ होती थी। उसे न तो अपहरण किया जाता था और न किसी को उसे बेचने का अधिकार था।

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मध्यकालीन राजस्व प्रशासन FAQ

Q 1. मध्यकाल में राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मूलाधार क्या था?

Ans – मध्यकाल में राज्य की आर्थिक व्यवस्था का मूलाधार कृषि एवं कृषि राजस्व ही था.

Q 2. मध्यकाल में भूमि का मालिक कौन होता था?

Ans – मध्यकाल में भूमि का मलिक राजा होता था.

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