मध्यकालीन पशुपालक जातियां

मध्यकालीन पशुपालक जातियां | मध्यकाल में पशुपालन एक महत्वपूर्ण आय का स्त्रोत था. उस समय कई पशुओं को पाला जाता था, जैसे की गाय, भेड़, घोडा, ऊँट इत्यादि

मध्यकालीन पशुपालक जातियां

गौपालक

गायों के पालनार्थ गूजरों द्वारा बसाये गए गाँव गोठ (संगोष्ठ) के नाम से प्रसिद्ध है।पशुओं को चराने का काम करने वाले व्यक्ति गुवालिया, ग्वालिया (स. गोपालक) या ‘घेरवाल्या’ कहलाता है। बच्चों को चराने गोप के लिए प्राकृत ‘वच्छवाली’ देश्य बच्छीवो शब्द आये हैं। गायों को पालने वाली जाति ‘गुजर (सं. गुर्जर) कहलाती है। पशुओं के धणों (स्तन) से दूध दोहने की क्रिया के लिए दुबारी शब्द प्रचलित है। दुबारी करने वाला ‘दुवाइया’ कहलाता है।

भेड़ पालक

भेड़ों को पालने वाला गायरी या गाडरी (संगद्दरिक) कहलाता है। राजस्थानी के एवाल मा एकात्यो शब्द, जो गाधरी के हो सूचक है, भी ‘अविपाल या अजापाल’ से व्युत्पन्न है। पश्चिमी राजस्थान में भेदपालक यो अविपाल को ‘गायरी’ कहते हैं। भेड़-बकरियों को घराने वाले प्रवालिया, गवालिया या गायरी कहलाते हैं।

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घोड़ा पालक

मारवाड़ में बेलर, सिन्धी, देशी, मारवाड़ी, काठियावादी, ताजी, तुर्की, अरबी, मालानी और पहाड़ी जाति के घोड़े पाये जाते हैं। इनमें मालानी अपनी उत्तमता के लिए जाने जाते हैं। घोड़े की सेवा टहल करने वाला व्यक्ति चारवादार कहलाता है। घोड़ों को बाँधने का स्थान तबेलों (फा अस्तबल), पायगा (फा पायगाह) या ‘ठाण’ (स्थान) कहलाता है। घोड़ों को प्रशिक्षित करने वाले ‘फेरण्या’ (सं. प्रेरणक) कहलाते हैं और घोड़ों के लक्षण जानने वाल ‘मलालोतरी’ (शालिहोत्री) कहलाते हैं। उत्तर पश्चिमी एवं दक्षिणी पूर्वी राजस्थान में मुख्यतः गुर्जर जाति ही घोड़ा पालन करती है।

मध्यकालीन पशुपालक जातियां
मध्यकालीन पशुपालक जातियां

ऊँट पालक

ऊंटों को प्रशिक्षण देने वाले व्यक्ति फेरा या फेरण्या कहलाते हैं।ऊंटों के साथ सुरक्षा की दृष्टि से चलने वाले व्यक्ति के लिए बोलाई शब्द प्रचलित है। ऊँटों की देखभाल और परिचय करने वाले व्यक्ति मारवाद में “राइका’ और मेवाड़ में रेबारी’ कहलाते हैं। राइका के लिए राइ, राइजी आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है।

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रेगिस्तान में ऊंटों की चलने वाली पंक्ति कतार और इनके साथ चलने वाले कतारिया कहलाते हैं। ऊंट के सवार को साँटी सवार, शुतर सवार (फा. शुत्र असवार) या ओठी (सं. ओष्ट्रिक) कहते हैं। ऊंटों की धीमी चाल वीखा कहलाती है। अधिक तेज चल पड़छया सूंड कहलाती है। रैवारियों के दो भेद है- (1) मारु और (2) चालकिया। मारु रैवारी केवल ऊंट पालते है जबकि चालकिया ऊंट के साथ-साथ भेड़-बकरियां भी पालते हैं।

अहीर

ये परम्परागत पशुपालक लोग है ये लोग गाय, भैंस आदि पशु पालते हैं, चराते हैं तथा दूध, घी, मठ्ठा आदि बेचते हैं।

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मध्यकालीन पशुपालक जातियां FAQ

Q 1. गायों को चराने का काम करने वाले व्यक्ति क्या कहलाता है?

Ans – गायों को चराने का काम करने वाले व्यक्ति गुवालिया, ग्वालिया या ‘घेरवाल्या’ कहलाता है।

Q 2. पशुओं के धणों (स्तन) से दूध दोहने की क्रिया के लिए कौनसा शब्द प्रचलित है?

Ans – पशुओं के धणों (स्तन) से दूध दोहने की क्रिया के लिए दुबारी शब्द प्रचलित है।

Q 3. भेड़ों को पालने वाला क्या कहलाता है?

Ans – भेड़ों को पालने वाला गायरी या गाडरी (संगद्दरिक) कहलाता है।

Q 4. घोड़े की सेवा टहल करने वाला व्यक्ति क्या कहलाता है?

Ans – घोड़े की सेवा टहल करने वाला व्यक्ति चारवादार कहलाता है.

Q 5. ऊंटों को प्रशिक्षण देने वाले व्यक्ति क्या कहलाते हैं?

Ans – ऊंटों को प्रशिक्षण देने वाले व्यक्ति फेरा या फेरण्या कहलाते हैं।

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