मध्यकालीन प्रमुख लाग-बाग

मध्यकालीन प्रमुख लाग-बाग | भू-राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग-बाग कहा जाता था। लाग दो प्रकार की थी

मध्यकालीन प्रमुख लाग-बाग

भू-राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग-बाग कहा जाता था। लाग दो प्रकार की थी। 1. नियमित तथा 2. अनियमित | नियमित लाग की रकम निश्चित होती थी तथा उनकी वसूली प्रतिवर्ष या दो-तीन वर्ष में एक बार की जाती थी। अनियमित लाग की रकम निश्चित नहीं थी। उपज के साथ-साथ ये कम या ज्यादा होती रहती थी। इन लागों के निर्धारण का कोई निश्चित आधार नहीं था।

लाग-बागों की संख्या कुछ राज्यों में 150 तक थी। उदाहरणार्थ सिराना, मलवा, कुन्सारी, गाँव खर्च, करदा, बट्टा, कसर, तुलाई, परवाई, नजराना, दस्तूर, लाटा, कूंता, शहनागी, हकपटेल पटवारी, कानूनगो, चौधरी एवं कामदार, पौना, भूम इत्यादि लागें भू-राजस्व के साथ नियमित रूप से वसूल की जाती थी। इसी प्रकार पशुपालन, सामान की निकासी, प्राकृतिक उत्पाद, कुटीर उद्योग इत्यादि पर भी लागें लगती थी। नल बट एवं नहरवास लाग सिंचित भूमि पर ली जाती थी।

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जागीरदारों राज्यों की घुड़सालों के लिये किसानों से फेर, कड़वी, घोड़े का भास, घोड़े का घी, रजका इत्यादि लागें लो जाती थी। इसी प्रकार छैली गिनती, खूंटा बन्दी, पान चराई, हासिल मवेशी जौहड़, हासिल चराई, ग्वाड़ा इत्यादि लाग पशुपालकों से वसूल की जाती थी। अनाज, चारा, पशु, बीज, खाद, कृषि यंत्र इत्यादि के आयात निर्यात पर भाषा, विरसा, वागली विसुंद, दान, अड़त, छापा, जकात इत्यादि लागें ली जाती थी।

मध्यकालीन प्रमुख लाग-बाग
मध्यकालीन प्रमुख लाग-बाग

कुटरी उद्योगों पर झोंपड़ी, धुआँभाद, तेलीघांडी, खाट एवं लकड़ी की लाग, सोना-चांदी एवं जरी सितारा, चरस लाग, पाठन, बिचौती मुड्डा एवं नारी डोरी, हासिल कार कंडेशन, रेजी लाग, ऊन खटीकान, लोहा मंडारी इत्यादि लाग वसूल की जाती थी। कुछ सामाजिक व सांस्कृतिक अवसरों से जुड़ी लागें भी थी जिनमें बागदान, नाता घरीचा, ढोल डंका, कांसा परोसा, चंवरी बाई जी का हाथ खर्च, कंवर जो का कलेवा, भेंट माताजी, भेंट होली, दिवाली एवं दशहरा इत्यादि सम्मिलित थी। एक ही राज्य के विभिन्न गांवों में ये भिन्न-भिन्न थी। कुछ लागे नकद व कुछ जिन्स के रूप में वसूल की जाती थी जैसे

  • राली लाग : प्रतिवर्ष काश्तकार अपने कपड़ों में से एक गद्दा या राली बनाकर देता था जो जागीरदार या उसके कर्मचारियों के काम आती थी।
  • बकरा लाग : प्रत्येक काश्तकार से जागीरदार एक बकरा स्वयं के खाने के लिए लेता था। कुछ जागीरदार बकरे के बदले प्रति परिवार से दो रुपया वार्षिक लेते थे।
  • दस्तूर : भू-राजस्व कर्मचारी पटेल, पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार एवं चौधरी जो अवैध रकम किसानों से वसूल करते थे उसे ‘दस्तूर’ कहा जाता था।
  • नजराना : यह लाग प्रतिवर्ष किसानों से जागीरदार एवं पटेल वसूल करते थे। जागीरदार राजा को एवं पटेल तहसीलदार को नजराना देता था जिसकी रकम किसानों से वसूल की जाती थी।
  • न्यौता लाग ; यह लाग जागीरदार पटेल एवं चौधरी अपने लड़के-लड़कों की शादी के अवसर पर किसानों से वसूल करते थे।
  • चंबरी लाग : किसानों के पुत्र या पुत्री के विवाह पर एक से पच्चीस रुपए तक चंबरी लाग के नाम पर लिए
  • कुंवर जी का घोड़ा : कुंवर के बड़े होने पर घोड़े की सवारी करना सिखाया जाता था। तब घोड़ा खरीदने के लिए प्रति घर से एक रुपया कर के रूप में लिया जाता था।
  • खर-गढ़ी : सार्वजनिक निर्माण या दुर्गा के भीतर निर्माण कार्यों के लिए गांवों से बेगार में गधों को मंगवाया जाता था, परन्तु बाद में गधों के बदले ‘खर गढ़ी’ लाग वसूल की जाने लगी।
  • खीचड़ी लाग : जागीरदार द्वारा अपने प्रत्येक गांव से उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार ली जाने वाली लाग राज्य की सेना जब किसी गांव के पास पड़ाव डालती, तब उसके भोजन के लिए गांव के लोगों से वसूली जाने वाली लाग खिचड़ी लाग कहलाती थी।
  • अंग-लाग : प्रत्येक किसान के परिवार के प्रत्येक सदस्य से जो पांच वर्ष से ज्यादा आयु का होता था प्रति सदस्य एक रुपया लिया जाता था, जिसे अंग-लाग कहा जाता था। इसी प्रकार लाग-बाग 100 से अधिक थी।
  • जाजम लाग : भूमि के विक्रय पर वसूली जाने वाली लाग
  • सिगोटी :बन मवेशी के विक्रय के समय वसूली जाने वाली लाग.

मारवाड़ में मालगुजारी के अतिरिक्त किसान से मलबा’ और ‘चौधर बाब’ जैसे कर वसूल करने की व्यवस्था थी। ‘मलबा’ की आय से फसल की रक्षा संबंधी किये गये व्यय की पूर्ति की जाती थी और उन व्यक्तियों को पारिश्रमिक देने की व्यवस्था रहती थी जिन्होंने बंटाई की प्रक्रिया में भाग लिया था। मारवाड़ में जागीर क्षेत्र में खारखार, कांस, शुकराना (खिड़की या बारी खुलाई) हासा, माचा हल, मवाली आदि प्रमुख लागे थी।

विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नाम से गृह कर लिया जाता था मारवाड़ में घर गिनती किवाड़ अथवा घर बाब, कोटा राज्य में घर बराड़, मेवाड़ में घर गिनती बराड, जयपुर राज्य में घर की छत और बीकानेर राज्य में यूँआ भाछ के नाम से यह कर वसूल किया जाता था। ‘घास मरी’ विभिन्न प्रकार के चराई करों का सामूहिक नाम था।

व्यावसायिक जातियों से लगभग सभी राज्यों में किसी न किसी नाम से कर लिया जाता था। मारवाड़ में रैगरों से खांदी खातियों से खरोद, मोचियों से पगरखी, मालियों से हीद भराई आदि के नाम कर लेने की प्रथा थी। बीकानेर राज्य में वसोले की भाछ (सुधारों से) एक रुपये से दस रुपये तक वसूल की गई।

मारवाड़ में प्रति व्यक्ति एक रुपये की दर से महाराजा मानसिंह के समय अंगा कर’ की वसूली की गई थी। राज्य में सेना के खर्च के नाम से जो कर लिया जाता था, उसे ‘खेड खर्च’ या ‘फोन खर्च की संज्ञा दी गई थी। मेवाड़ में युद्ध के समय ‘गनीम बराड़’ नामक युद्ध कर वसूल किया जाता था मारवाद में सवार खर्च या फौजवल के नाम से किसी क्षेत्र विशेष में घुड़सवार रखने के लिए कर लिया जाता था।

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विधवा के पुनर्विववाह के अवसर पर प्रति विवाह एक रुपये की दर से कागली’ या ‘नाता’ कर लिया जाता था। मेवाड़ में ‘नाता बराह कोटा राज्य में नाता कागली’ चौकानेर राज्य में ‘नाता’ और जयपुर राज्य में ‘छेली राशि’ के नाम से यह कर लिया जाता था।

बीकानेर राज्य में सीमा शुल्क, आयात-निर्यात तथा चुंगी-कर का सामूहिक नाम ‘जकात’ था। जोधपुर और जयपुर राज्यों में परिभाषिक भाषा में इसे ‘सायर’ की संज्ञा दी गई थी। मेवाड़ और जैसलमेर राज्यों में माल के आयात-निर्यात पर लगाया जाने वाला कर ‘दाण’ कहलाता था। मेवाड़ में एक गांव में दूसरे गांव में माल लाने ले जाने पर ‘मापा’ ‘बारुता कर लिया जाता था जब कि बीकानेर राज्य में बिक्री कर को ‘मापा’ के नाम से पुकारते थे।

जंगलात की लकड़ियों पर लाकड़ कर लिया जाता था। जलाने के लिए जंगलों से लकड़ियां प्राप्त करने पर राजकीय कर देना पड़ता था। इस कर को बीकानेर में काठ, जयपुर में दरखत-की-बिछोतो, मेवाड़ में खड़लाकड़ और मारवाड़ में ‘कबाड़ा बाब’ के नाम से पुकारते थे।

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मध्यकालीन प्रमुख लाग-बाग FAQ

Q 1. लाग-बाग किसे कहा जाता था?

Ans – भू-राजस्व के अतिरिक्त कृषकों से कई अन्य प्रकार के कर वसूल किए जाते थे उन्हें लाग-बाग कहा जाता था.

Q 2. लाग कितने व कौन-कौनसे प्रकार की होती थी?

Ans – लाग दो प्रकार की थी – 1. नियमित तथा 2. अनियमित.

Q 3. लाग-बागों की संख्या कुछ राज्यों में कितने तक थी?

Ans – लाग-बागों की संख्या कुछ राज्यों में 150 तक थी.

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