मध्यकालीन कृषक वर्ग

मध्यकालीन कृषक वर्ग | मध्यकाल में कृषकों को विभिन्न वर्गों में बांटा गया था. इस समय में कृषकों के विभिन्न वर्ग एवं विभिन्न प्रकार होते थे

मध्यकालीन कृषक वर्ग

मध्यकाल में कृषकों को विभिन्न वर्गों में बांटा गया था. इस समय में कृषकों के विभिन्न वर्ग एवं विभिन्न प्रकार होते थे जो निम्नलिखित है

बापीदार/ बिस्वादार

खालसा क्षेत्र में जिन किसानों को स्थाई भू-स्वामित्व प्राप्त था उन्हें बिस्वादार अथवा मापीदार के नाम से जाना जाता था। इसके अन्तर्गत किसानों को पीढ़ी दर पीढ़ी स्थाई भू-स्वामित्व के अधिकार प्राप्त थे। इन काश्तकारों को मोहरछाम लिखित पट्टा प्रदान किया जाता था। ऐसे काश्तकार पट्टे में उल्लेखित भूमि को जोतने के वंशानुगत निजी अधिकारों का उपयोग करते थे परन्तु ये ग्रन्य की नीतियों व नियमों से पावन्द थे।

इन किसानों को राज्य की ओर से अनेक रियायतें दी जाती थी। उनके खेत को लकड़ी व पास पर उनका स्वामित्व माना जाता था। कुएँ खोदकर या अन्य उपायों द्वारा अपनी पैदावार बढ़ाने के लिए बापीदार जो उपाय अपनाते थे, कर निर्धारण के समय उनका ध्यान रखा जाता था। भूमि का स्वामित्व उनका था जो खेती करते थे। ऐसी भूमि उनको बपौती कहलाती थी जिसे ‘दखाला’ कहते थे।

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रैयती

राजस्थान में प्रचलित रैयतवादी प्रणाली ब्रिटिश भारत की रैयतवादी प्रणाली से भिन्न थी। इस प्रणाली के अन्तर्गत किसानों को फसल वर्ष के आरम्भ में पट्टे दिये जाते थे, किसानों अपनी जोतों पर स्थाई अधिकार प्राप्त नहीं थे। उन किसानों का भू-स्वामित्व फसल वर्ष की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो जाता था।

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नए फसल वर्ष में किसानों को नए पट्टे मिलते थे एवं किसान को इस बात की गारंटी नहीं थी कि उसे वही भूमि नए फसल वर्ष में पट्टे पर मिलेगी जो पिछले वर्ष में उसकी ओत के अन्तर्गत थी। इस प्रकार ऐसे कृषक जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे रैयती कहलाते थे और यह व्यवस्था रैयतवाड़ी कहलाती थी।

मध्यकालीन कृषक वर्ग
मध्यकालीन कृषक वर्ग

नान कर (बेगार प्रथा)

नानकर का तात्पर्य रोटी के लिए कार्य करना था। इन लोगों की स्थिति जागीर क्षेत्रों जैसी ही थी। इनसे न कोई लाग ली जाती थी न ही किसी प्रकार की सेवा इनसे मात्र उत्तराधिकारी शुल्क लिया जाता था किसी व्यक्ति से बिना सहमति एवं मजदूरी के काम लेने को ‘बेगार’ कहा जाता है। राजा, जागीरदार एवं उनके कर्मचारी प्रजा से बेगार होना अपना हक समझते थे। बेगार के कई प्रकार थे।

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ब्राह्मणों एवं राजपूतों को छोड़कर सभी जातियों को बेगार देने के लिए विवश किया जाता था। जागीर क्षेत्र में लाग-बागों का स्वरूप बड़ा ही भयंकर था निम्न जाति के किसानों से भू-राजस्व, लाग बार्गे भी अधिक मात्रा में वसूल की जाती थी। अत: यह वर्ग सामाजिक एवं आर्थिक दोनों हो रूपों में पिछदा एवं शोषित था।

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पाहीकाश्त

जिन किसानों के पास अपने गाँव में कृषि भूमि नहीं भी वे अन्य गाँव में कृषि भूमि प्राप्त करते थे। ऐसे किसानों को पाही काश्तकार कहा जाता था अर्थात् किसी दूसरे गाँव से आकर खेती करने वाला कृषक ‘पाही’

गैर बापीदार कृषक

गैर बापोदार कृषक की भूमि पर किसी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं थे। वह मात्र शिकमी काश्तकार (यह किसान जो दूसरे काश्तकार से खेत लेकर जोतता है) होता था। अपनी भूमि को गिरवी रखने का अधिकार नहीं था।

रियायती

गांव के ऐसे मूल कृषक जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त थे, रियायती कहलाते थे।

गेवती

गांव में ही स्थायी रूप से रहने वाला कृषक ‘गेवती’ कहलाता था।

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मध्यकालीन कृषक वर्ग FAQ

Q 1. खालसा क्षेत्र में जिन किसानों को स्थाई भू-स्वामित्व प्राप्त था उन्हें किस नाम से जाना जाता था?
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Ans – खालसा क्षेत्र में जिन किसानों को स्थाई भू-स्वामित्व प्राप्त था उन्हें बिस्वादार अथवा मापीदार के नाम से जाना जाता था.

Q 2. रैयती कृषक किसे कहा जाता था?

Ans – ऐसे कृषक जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे रैयती कहलाते थे.

Q 3. नानकर का तात्पर्य क्या था?

Ans – नानकर का तात्पर्य रोटी के लिए कार्य करना था.

Q 4. गांव में ही स्थायी रूप से रहने वाला कृषक क्या कहलाता था?

Ans – गांव में ही स्थायी रूप से रहने वाला कृषक ‘गेवती’ कहलाता था.

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