महाराजा कर्णसिंह

महाराजा कर्णसिंह | सूरसिंह के मरणोपरांत उनके ज्येष्ठ पुत्र कर्णसिंह 1631 ई. में बीकानेर के सिंहासन पर आरूढ़ हुए। औरंगजेब ने इसे ‘जांगलधर बादशाह’ की उपाधि प्रदान की

महाराजा कर्णसिंह

सूरसिंह के मरणोपरांत उनके ज्येष्ठ पुत्र कर्णसिंह 1631 ई. में बीकानेर के सिंहासन पर आरूढ़ हुए। गद्दीनशीनी के बाद कर्णसिंह बादशाह शाहजहां की सेवा में उपस्थित हुआ तो उसे 2000 जात और 1500 सवार का मनसब दिया गया। ये बीकानेर के प्रतापी शासक थे। नागौर के अमरसिंह राठौड़ एवं बीकानेर के कर्णसिंह राठौड़ के मध्य 1644 ई. में मतीरे की राड़ हुई, जिसमें कर्णसिंह राठौड़ की विजय हुई।

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कुछ वर्षों बाद कर्णसिंह का अधीनस्थ पूगल का राव सुदर्शन भाटी (जगदवोत) विद्रोही हो गया तो महाराजा कर्णसिंह ने ससैन्य चढ़ाई कर ‘पूगल गढ़’ पर अधिकार कर लिया। बीकानेर मुलतान के मध्य का प्रदेश पूगल ने पंवारों से लिया था। बीका के श्वसुर शेखा के वंशजों ने अब पूगल का बंटवारा करने की प्रार्थना कर्णसिंह से की। अंत में कर्णसिंह ने शेखा के वंशेजों में पूगल का बंटवारा कर दिया।

महाराजा कर्णसिंह
महाराजा कर्णसिंह

शाहजहां के 22वें राज्य वर्ष (ई.स. 1648-49) में कर्णसिंह का मनसब बढ़कर 2000 जात तथा 2000 सवार हो गया। एक वर्ष बाद ही उसका मनसब 2500 जात और 2000 सवार हो गया। 1652 ई. में कर्णसिंह का मनसब बढ़कर 3000 जात और 2000 सवार हो गया।

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औरंगजेब ने इसे ‘जांगलधर बादशाह’ की उपाधि प्रदान की। मुगल शहजादों में उत्तराधिकार संघर्ष के समय कर्णसिंह तटस्थ रहे। लेकिन उन्होंने अपने दो पुत्रों-पद्मसिंह और केसरीसिंह को औरंगजेब की ओर से भेजा। कर्णसिंह अपने दो पुत्रों- केसरीसिंह और पद्मसिंह के साथ दरबार पहुंचा। बादशाह ने कर्णसिंह को औरंगाबाद भेज दिया, ‘दयालदास री ख्यात’ और पाउलेट “गैजेटियर ऑव् द बीकानेर स्टेट” में पाया जाता है कि बादशाह औरंगजेब ने 23 सितंबर, 1664 के फरमान में लिखा कि ‘औरंगाबाद सूबे के अंतर्गत बनवारी और कर्णपुरा के जिले- राव कर्ण के है।

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महाराजा कर्णसिंह ने औरंगाबाद रहते हुए कर्णपुरा, केसरीसिंहपुरा और पद्मपुरा, गांव नए बसाये थे। फारसी तवारीखां के अनुसार औरंगाबाद पहुंचने के लगभग एक वर्ष बाद कर्णसिंह का देहांत हो गया। कर्णसिंह की स्मारक छतरी के लेख में पाया जाता है कि 22 जून, 1669 में मृत्य हुई। कर्णसिंह के काल की रचनाओं में साहित्य कल्पद्रुम व गंगानंद मैथिली द्वारा रचित कर्णभूषण व काव्य डाकिनी प्रमुख हैं। भट्ट होसिहक ने ‘कर्णावतंस’ तथा कवि मुद्रल ने ‘कर्णसन्तोष’ की रचना की। इन्हीं के समय ‘वृत्तसारावली’ की रचना हुई।

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महाराजा कर्णसिंह FAQ

Q 2. सूरसिंह के मरणोपरांत बीकानेर के सिंहासन पर कौन आरूढ़ हुए थे?

Ans – सूरसिंह के मरणोपरांत उनके ज्येष्ठ पुत्र कर्णसिंह बीकानेर के सिंहासन पर आरूढ़ हुए.

Q 3. कर्णसिंह को ‘जांगलधर बादशाह’ की उपाधि किसने प्रदान की थी?

Ans – कर्णसिंह को औरंगजेब ने ‘जांगलधर बादशाह’ की उपाधि प्रदान की थी.

Q 4. ‘मतीरे की राड़’ नामक घटना कब हुई थी?

Ans – ‘मतीरे की राड़’ नामक घटना 1644 ई. में हुई थी.

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