महाराजा गजसिंह

महाराजा गजसिंह | जब दक्षिण में सवाई राजा शूरसिंह की मृत्यु हो गयी तो जहाँगीर ने उनके पुत्र गजसिंह के लिए सिरोपाव भेजे और 1619 ई. में बुरहानपुर में इनके टीके की रस्म की प्रथा की अदायगी की

महाराजा गजसिंह

जब दक्षिण में सवाई राजा शूरसिंह की मृत्यु हो गयी तो जहाँगीर ने उनके पुत्र गजसिंह के लिए सिरोपाव भेजे और 1619 ई. में बुरहानपुर में इनके टीके की रस्म की प्रथा की अदायगी की। इसे 3000 जात एवं 2000 सवार का मनसब दिया गया तथा झण्डा और राजा की उपाधि दी।

1621 ई. में इनको शहजादा खुर्रम के विरुद्ध 5000 जात व 4000 सवार का पद देकर भेजा गया। उमरा-ए-हनूद में लिखा है कि जहांगीर के शासन काल में गजसिंह का मनसब बढ़ते-बढ़ते 5000 जात/5000 सवार हो गया था। मुगल सम्राट जहाँगीर ने गजसिंह की वीरता से प्रसन्न होकर उसे ‘दलथंभन’ (फौज को रोकने वाला) की उपाधि दी एवं उनके घोड़े को शाही दाग से मुक्त कर दिया।

1630 ई. में जोधपुर नरेश गजसिंह को बादशाह शाहजहां ने ‘महाराजा’ की उपाधि दी। महाराजा गजसिंह का बड़ा पुत्र अमरसिंह था, लेकिन महाराजा ने अपने छोटे पुत्र जसवंतसिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

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‘जोधपुर राज्य की ख्यात’ में पाया जाता है कि ‘अनारा’ नाम की किसी नवाब की स्त्री से गजसिंह का गुप्त प्रेम हो गया था। यह खबर फैली तो अनारों के कहने से गजसिंह उसे उसके महलों से निकाल कर जोधपुर ले गया। एक दिन महाराजा जब अनारों के महलों में था, कुंवर जसवंतसिंह उसके पास गया। उसको देखते ही महाराजा और अनारों जैसे ही खड़े हुए, वैसे ही जसवंतसिंह ने उनके जूते उठाकर उनके आगे धर दिए।

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अनारां ने कहा कि यह आप क्या कर रहे हो, मैं तो महाराजा की दासी हूँ, तो कुंवर ने कहा कि आप तो मेरी माता के समान है। इससे अनारां उस पर बड़ी प्रसन्न हुई और उसने महाराजा से जसवंतसिंह को ही उत्तराधिकारी बनाने का वचन ले लिया। अमरसिंह के उद्दण्डी एवं स्वच्छेचारी स्वभाव के कारण वह उससे अप्रसन्न रहती थी और उसकी महाराजा से बुराई करती थी।

महाराजा गजसिंह
महाराजा गजसिंह
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ऐसे ही अन्य कई कारणों से महाराजा ने अमरसिंह के स्थान पर छोटे पुत्र जसवंत सिंह को अपना उत्तराधिकारी नियत किया। ‘जोधपुर राज्य की ख्यात’ में पाया जाता है कि आगरा रहते समय महाराजा बीमार पड़ा। 6 मई, 1638 को महाराजा का देहांत हो गया और उसका अंतिम संस्कार आगरा में यमुना नदी के किनारे हुआ।

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महाराजा गजसिंह के 10 रानियां थी जिनसे उसके तीन पुत्र थे अमरसिंह, जसवंतसिंह और अचलसिंह। बांकीदास कृत ‘ऐतिहासिक बाते’ में उसकी एक पुत्री चन्द्रकुंवर बाई का विवाह बांधोगढ़ के स्वामी अमरसिंह के साथ होना पाया जाता है। महाराजा की रानियों में चन्द्रावत कश्मीरदे ने गांगेलाव तालाब और बाघेली कुसुमदे ने कागड़ी तालाब बनवाए।

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महाराजा गजसिंह FAQ

Q 1. गजसिंह के टीके की रस्म की प्रथा की अदायगी कब की गई थी?

Ans – गजसिंह के टीके की रस्म की प्रथा की अदायगी 1619 ई. में की गई थी.

Q 2. गजसिंह के टीके की रस्म की प्रथा की अदायगी कहाँ की गई थी?

Ans – गजसिंह के टीके की रस्म की प्रथा की अदायगी बुरहानपुर में की गई थी.

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Q 3. सवाई राजा शूरसिंह की मृत्यु के बाद किसे जोधपुर का शासक बनाया गया था?

Ans – सवाई राजा शूरसिंह की मृत्यु के बाद गजसिंह को जोधपुर का शासक बनाया गया था.

Q 4. गजसिंह को दलथंभन की उपाधि किसने दी थी?

Ans – गजसिंह को दलथंभन की उपाधि जहाँगीर ने दी थी.

Q 5. महाराजा गजसिंह का बड़ा पुत्र कौन था?

Ans – महाराजा गजसिंह का बड़ा पुत्र अमरसिंह था.

Q 6. महाराजा गजसिंह ने अपना उत्तराधिकारी किसे घोषित किया था?

Ans – महाराजा गजसिंह ने अपना उत्तराधिकारी अपने छोटे पुत्र जसवंतसिंह को घोषित किया था.

Q 7. राजा गजसिंह का देहांत कब हुआ था?

Ans – राजा गजसिंह का देहांत 6 मई, 1638 को हुआ था.

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