मध्यकालीन राजस्थान की रहन-सहन

मध्यकालीन राजस्थान की रहन-सहन | मध्यकालीन राजस्थान के निवासियों की वेशभूषा, खान-पान और आचार-विचार को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि यहां का समाज दो वर्गों में बंटा हुआ था

मध्यकालीन राजस्थान की रहन-सहन

मध्यकालीन राजस्थान के निवासियों की वेशभूषा, खान-पान और आचार-विचार को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि यहां का समाज दो वर्गों में बंटा हुआ था। उच्च वर्ग के लोगों का रहन-सहन निम्न वर्ग के लोगों से भिन्न था। उच्च वर्ग के लोग गर्मी के मौसम में सफेद और चिकन का कानों (कु) पहनते थे। जब मकान से बाहर जाते थे तो खेस, शाल अथवा पामदी को दो अथवा चार तह करके अपने कंधे पर डाल लेते थे।

त्यौहार के अवसरों पर दागली, धाँधी, दोवडा और साफा पहनते थे। रूमाल, गुलबन्द, कमरबन्द और दुपट्टा भी खास-खास अवसरों पर धारण करते थे मुगलों के सम्पर्क में आने के बाद सलवार, चुस्त पैजामा, इजारबन्द इत्यादि भी यहां के उच्च वर्ग के लोगों ने पहनना प्रारम्भ कर दिया था। पांवों में लाल रंग की नुकीली जूतियां पहनी जाती थी और राजा महाराजा कामदार जूतियों का प्रयोग करते थे।

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साधारण व्यक्ति चार वस्त्र धारण करते थे। धोती, कमर से ऊपर का तन ढकने के लिए बख्तरी, साफा या फेंटा और गले दुपट्टा ब्राह्मण पीले रंग की धोती पहनते थे और शरीर पर उपरना रखते थे। आदिवासियों की वेशभूषा दूसरे लोगों से भिन्न होती थी। पीटर मुंडी ने आधुनिक भरतपुर के आसपास के लोगों को फ्राँक और कमरबन्द पहने हुए देखा था जैसा कि उसके यात्रा संस्मरणों से जाहिर होता है। भिखमंगे साधु और संन्यासियों की वेशभूषा अपने ढंग को निराली होती थी। यह लंगोट अथवा जानवरों की खाल धारण करके अपनी आवरु इकते थे।

स्त्रियां साड़ी पहनती थी। ‘बोडिस’ अथवा चोली पहिन कर कमर से ऊपर के भाग को ढकती थी और सिर पर ओदनी इकती थी। आदिवासी जाति की स्त्रियां घाघरा अथवा घाघरी पहनती थी। मुगल प्रभाव के कारण साड़ी इतनी लम्बी पहनी जाने लगी कि उसी का घूंघट भी निकाला जा सके। मुस्लिम प्रभाव के कारण स्त्रियों ने पूरी आस्तीन की चोली पहनना प्रारम्भ कर दिया था जो कुर्ती कहलाती थी। लेकिन आधी आस्तीन की चोली भी लुप्त नहीं हुई थी। इसी समय घेरदार घाघरा प्रचलित हुआ। इसे कालान्तर में लहँगा कहकर पुकारा जाने लगा।

साधन-सम्पन्न परिवार की स्त्रियां पटका या दुपट्टा भी पहनती थी। कतिपय स्त्रियां पुरुषों के सादृश्य लांगदार पीले रंग की धोती पहनती थी। रंगीन सेन्डिल जिन पर सोने का काम हुआ करता था, उसे उच्च परिवार की स्त्रियां पैरों में पहनती थी। अटलास, जमघनी, किमखाब, टसर, चिन्ट पारचो, थिरना, चिक इत्यादि शारीरिक सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए पहने जाते थे। राजस्थानी स्त्रियों की वेशभूषा आकर्षक होती थी। इसीलिए आईने अकबरी के लेखक के अनुसार अकबर के काल में उन्हें बड़ी हिफाजत से रखा जाता था और विशेष अवसरों पर मुगल हरम की हिन्दू स्त्रियां उन्हें धारण करती थी।

मध्यकालीन राजस्थान की स्त्रियां कानों में कुण्डल, गले में हार, बाहों पर बाजूबंद, हाथ की अंगुली में अंगूठी पहनती थी। विवाहित स्त्रियां शीशफूल, रखड़ी, बोर और टीका धारण करती थी। उच्च परिवार की स्त्रियां कीमती आभूषण धारण करती थी जिन्हें कर्णफूल, फूल, झूमका इत्यादि कहकर सम्बोधित किया जाता था। नाक में नथ या बारी और नखो की सुन्दरता बढ़ाने के लिए चौपा पहना जाता था। जोधपुर की ‘हवाला बही’ और बाँकीदास ख्यात में आभूषणों का विस्तारपूर्वक वर्णन है जिन्हें उच्च और निम्न कुल की स्त्रियां मध्यकाल में पहनती थी। स्त्रियों के साथ-साथ छोटी उम्र के बच्चे भी आभूषण पहिनते थे। मध्य आयु के बालक कड़ा पहनते थे।

मध्यकालीन राजस्थान की रहन-सहन
मध्यकालीन राजस्थान की रहन-सहन

शारीरिक सौन्दर्य वृद्धि के उपक्रम भी प्रयोग में लिए जाते थे। उबटन, सुगन्धित तेलों का प्रयोग, बेणी इत्यादि का प्रयोग प्रचलित था। क्रीम और पाउडरों के स्थान पर चोला, अवहीर, अम्बर और अरगजा का प्रयोग किया जाता था। काजल और हिना का प्रयोग भी प्रचलित था। विवाहित स्त्रियों की हथेली की शोभा बढ़ाने के लिए हिना (मेंहदी) लगाई जाती थी।

मध्यकालीन राजस्थान के हिन्दू अधिकांशत: शाकाहारी थे। कृषक खाटा, राबा और मोटी रोटियां खाने के अभ्यस्त थे। उस समय राजस्थान में मजदूरी का भुगतान खाने के रूप में किया जाता था। कोटा रिकार्ड्स को पढ़ने से पता चलता है कि एक मजदूर की दिन भर की मजदूरी के एवज में घुघरी, उबाला हुआ बाजरा या मक्का दी जाती थी। जोधपुर में भी हरकारों और सैनिकों को आटा, घी, गुड़ और नमक दिया जाता था, लेकिन सम्पन्न व्यक्ति चपाती, सूखे मेवे और दालें या खिचड़ी का प्रयोग करते थे। भोजन पत्तलों और लकड़ी की वाटकों (प्यालों) में किया जाता था।

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भोजन के साथ शीतल जल ही उनका एकमात्र पेय पदार्थ होता था। उच्च वर्ग के व्यक्ति भोजन के साथ मिठाई का प्रयोग करते थे। घेवर, फीनी इत्यादि आधुनिक मिठाइयां उस समय भी लोकप्रिय थी। उनकी सब्जी मिर्च-मसालों के साथ घी में तैयार की जाती थी। भोजन से पहले सूप लेते थे। भोजन के साथ अचार, मुरब्बे और पापड़ का प्रयोग करते थे। भोजन की समाप्ति से पूर्व दही खाते थे। तैयार भोजन सोने, चाँदी अथवा लकड़ी की चौकी पर रखा जाता था। जमीन पर सफेद कपड़ा बिछाया जाता था जो पातियां कहलाता था। भोजन करते समय ब्राह्मण रेशमी धोती पहनकर अन्य लोगों से पृथक् आसन पर बैठते थे। भोजन करने से पूर्व तथा उसके पश्चात् हाथ और पैर धोए जाते थे। अन्त में पान दिया जाता था।

शादी-विवाह अथवा धार्मिक अनुष्ठानों के समय जब मित्र व संबंधी निमंत्रित किए जाते थे उस समय गुड़ को लापसी, लड्डू, चूरमा, सीरा (हलुवा) तथा घीया, करेला, बैंगन इत्यादि की सब्जी बनाई जाती थी। उस समय आचार के साथ नींबू भी परोसा जाता था।

मध्यकाल के राजपूत मांसाहारी थे, अतएव उनका मांसाहारी भोजन उनकी मर्जी के मुताबिक बनाया जाता था। उस भोजन में पुलाव और काबुली मनपसन्द पदार्थ माने जाते थे। मांसाहारी भोजन के साथ मदिरा की मनवार भी की जाती थी। महुआ, मोगर अथवा गोलसार नामक शराब उस काल में प्रचलित थी। द्विज वर्ण के लोग भांग का प्रयोग करते थे। मध्यकालीन राजस्थान में जर्दा और सुरती का प्रयोग प्रचलित था। मुगल प्रभाव के कारण हुक्का और चिलम का प्रयोग लोकप्रिय होता जा रहा था।

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मध्यकालीन राजस्थान की रहन-सहन FAQ

Q 1. मध्यकालीन समाज कितने वर्गों में बांटा गया था?

Ans – मध्यकालीन समाज दो वर्गों में बंटा हुआ था.

Q 2. मध्यकालीन समाज कौन-कौनसे वर्गों में बंटा हुआ था?

Ans – मध्यकालीन समाज उच्च वर्ग व निम्न वर्ग में बंटा हुआ था.

Q 3. मध्यकालीन भोजन के साथ कौनसा एकमात्र पेय पदार्थ होता था?

Ans – मध्यकालीन भोजन के साथ शीतल जल ही उनका एकमात्र पेय पदार्थ होता था.

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