हल्दीघाटी का युद्ध

हल्दीघाटी का युद्ध | 18 जून, 1576 ई. (आषाढ़ बंदी दिसं. 1633) को प्रातः हल्दीघाटी, राजसमंद में युद्ध भेरी बजी | इस युद्ध को सबसे पहले हल्दीघाटी जेम्स टॉड ने कहा था

हल्दीघाटी का युद्ध

18 जून, 1576 ई (आषाढ़ बंदी दिसं. 1633) को प्रातः हल्दीघाटी (राजसमंद) में युद्ध भेरी बजी राणा की ओर से पहला वार इतना जोशीला था कि मुगल सैनिक चारों ओर जान बचाकर भाग गये बदायूँनी जो मुगल दल में और जिसने इस युद्ध का आँखों देखा हाल लिखा है, स्वयं भाग खड़ा हुआ मुगलों को आरक्षित फौज के प्रभारी मिहत्तर खां ने यह झूठी अफवाह फैला दी की ‘बादशाह अकबर स्वयं शाही सेना लेकर आ रहे हैं।

अकबर के सहयोग की बात सुनकर मुगल सेना को हिम्मत बंधी और अपने पहले मोर्चे में असफल होने से सेना बनास नदी के कोठे वाले मैदान में जिसे ‘रक्त ताल’ कहते हैं, आ जमे। यहाँ दोनों दल बारी-बारी से भिड़ गये। दोपहर का समय हो गया। युद्ध की गरमागरमी को, जैसे बदायूँनी लिखता है, सूर्य ने अपनी तीक्ष्ण किरणों से अधिक उत्तेजित कर दिया, जिससे खोपड़ी का खून उतरने लगा।

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सभी ओर से योद्धाओं को हलचल में भीड़ ऐसो मिल गयी कि शत्रु सेना के राजपूत और मुगल सेना के राजपूतों को पहचानना कठिन हो गया। इस समय बदायूँनी ने आसफ से पूछा कि ऐसी अवस्था में हम अपने और शत्रु के राजपूतों की पहचान कैसे करें ? उसने उत्तर दिया कि तुम तो अपना बार करते जाओ, चाहे जिस पक्ष का भी राजपूत मारा जाये, इस्लाम को हर दशा में लाभ होगा।

हल्दीघाटी का युद्ध
हल्दीघाटी का युद्ध

हाथी युद्ध :

प्रथम आक्रमण के दौरान युगल केन्द्र बिखर गया मानसिंह द्वारा मुगल लाइन को पुनः स्थिर किया गया। जब लगातार तीरों की वर्षा एवं तोपखाने के गोलों को तीनों ओर में बीछार होने लगी तो राणा के खेमे में निराशा छाने लगी। लेकिन राणा ने अपने दो युद्धरत हाथियों ‘लूना एवं रामप्रसाद’ को युद्ध करने का आदेश दिया। प्रताप की सेना में खांडेराव और चक्रवाप नामक हाथी भी थे।

इस युद्ध में तो तीर न ही गोलियां चली और न ही तोपखाना गरजा केवल कवचधारी एवं अपनी सुण्डों में जहरीली खंजर लिए हुए तथा पूछों में धारदार तलवारें लिए हुए लूना और रामप्रसाद शत्रु की सेना को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे। आतंक वस्व मुगलों में लूना के विरुद्ध जो केन्द्र की ओर बढ़ रहा था अपने हाथी गज-मुक्ता’ (गजमुख) को मैदान में उतार दिया। इतने में ही लूना के महावत के सिर में गोली मार दी गई।

रामप्रसाद दाहिने हरावल की ओर तेजी से आगे बढ़ा दूसरी ओर दो ‘गजराज एवं रन-मदार’ (Ran-Madar) आगे बढ़े तथा हाथियों में खूनी संघर्ष शुरू हुआ। इससे पहले की खूनी संघर्ष पूरा होता रामप्रसाद के महावत को भी गोली मार दी गई। एक मुगल महावत ने रामप्रसाद की पीठ पर सवार होकर उसे नियंत्रण में ले लिया। मुगल हाथी

राणा कीका अपने साथी लूणकर्ण, रामशाह, ताराचन्द, पूँजा, हकीम सूर आदि के साथ शत्रु दल को चीरता हुआ मानसिंह के हाथों के पास पहुंच गया। मानसिंह अपने हाथी ‘मर्दाना’ के होने पर बैठा। प्रताप मानसिंह को और बढ़ा। राणा के चेतक ने मानसिंह के हाथी पर अगले पैर रखे तथा प्रताप ने अपने पाले का कर किया जो मानसिंह के हाथी पर बैठे महावत के शरीर को पार कर हौदे को पार कर गया, इस बार को मानसिंह बचा गया।

मानसिंह हौदे में छुप गया। प्रताप ने सोचा को मानसिंह मर गया। लेकिन महावत होन हाथी ने अपने खंजर से चेतक का एक पैर काट दिया। प्रताप को शत्रु सेना ने घेर लिया। लेकिन प्रताप ने संतुलन बनाए रखा तथा अपनी शक्ति का अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए मुगल सेना में उपस्थित बलिष्ठ पठान बहलोल खां के वार का ऐसा प्रतिकार किया कि खान के जिरह बख्तर सहित उसके घोड़े के भी दो फाड़ हो गए। राणा के युद्ध क्षेत्र से हटने से पूर्व सादही का झाला बोदा राणा सिर से छत्र खींचकर स्वयं धारण कर मानसिंह के सैनिकों पर झपट पड़ा और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।

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टूटी टोग के घोड़े से राणा अधिक दूर पहुंचा था कि मार्ग में ही भाटी के दूसरे नाके के पास चेतक की मृत्यु हो गयी। राणा ने उसके अन्तिम संस्कार द्वारा अपने प्यारे घोड़े को श्रद्धांजलि अर्पित को बलीचा नामक स्थान पर आज भी चेतक की समाधि उपस्थित है। इस घटना के साथ बताया जाता है कि शक्तिसिंह भी जो मुगल दल के साथ उपस्थित था, किसी तरह बचकर जाते हुए राणा के पोछे चल दिया। उसी समय नीला थोडा असवार’ शब्द राणा ने सुने प्रताप ने सिर उठाकर देखा तो सामने उसके भाई शक्तिसिंह को पाया शक्तिसिंह ने अपनी करनी पर लज्जित होकर बड़े भाई के चरण पकड़ कर क्षमा याचना की।

इसकी जानकारी हमें अमर काव्य वंशावली ग्रंथ व राजप्रशस्ति से मिलती है। राजपूतों ने अपने जीवन की बाजी लगाना आरम्भ कर दिया, जिससे एक के बाद दूसरा धराशाही होता गया। ऐसे वीरों में नेतनी, रामशाह अपने पुत्रों के साथ, राठौड़ शंकरदास, भीम डोडिया, कांधल, हाकिम खां सूर, झाला मानसिंह आदि मुख्य थे।

राणा के साथ ही उसकी बची सेना कोल्यारी पहुंची। घायलों का वहां उपचार किया गया। रणक्षेत्र से बचने वालों में सलूम्बर का रावत कृष्णदास चूडावत, घाणेराव का गोपालदास, भामाशाह, ताराचन्द आदि प्रमुख थे। दूसरे दिन मानसिंह अपने सैनिकों के साथ गोगुन्दा की ओर रवाना हो गया। मुगल सेना के आदमी एक-एक कर लौट गये। अकबर का यह सैन्य अभियान असफल रहा तथा पासा महाराणा प्रताप के पक्ष में था।

युद्ध के परिणाम से खिन्न अकबर ने मानसिंह और आसफ खां की कुछ दिनों के लिये इयोड़ी बंद कर दी अर्थात् उनको दरबार में सम्मिलित होने से वंचित कर दिया।

बदायूँनी ने युद्ध में दोनों पक्षों के योद्धाओं के मरने व घायल होने वालों की संख्या भी दी है। उसके अनुसार कुल 500 आदमी रण क्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुए जिनमें 120 मुसलमान और शेष 380 हिन्दू थे। 300 से अधिक मुसलमान घायल हुए थे। अबुल फजल के अनुसार 150 मुसलमान और 500 शत्रु पक्ष के आदमी मारे गये थे। अकबर ने अपनी ओर से महमूदखां नामक व्यक्ति को बुद्ध व सेना सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने हेतु गोगुन्दा भेजा। उसने लौटकर सम्पूर्ण स्थिति की जानकारी दी।

बदायूँनी ने बादशाह को रामप्रसाद हाथी और युद्ध की रिपोर्ट प्रेषित की। बादशाह ने हाथी का नाम रामप्रसाद से बदल कर पीरप्रसाद रखा। जेम्स टॉड ने अपनी ‘अनाल्स एण्ड एंटीक्यूटीज ऑफ राजस्थान’ में प्रथम बार इस युद्ध को हल्दीघाटी के नाम से संबोधित किया, तब से यह लड़ाई हल्दीघाटी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध हो गई। रामशाह तंवर जैसे अनुभवी सामन्तों की सलाह थी कि शत्रु से खुले मैदान में लड़ाई नहीं लड़ी जाये।

देश की स्वतंत्रता के लिए दीर्घकालीन युद्ध संचालन की नीति अपनाई जानी चाहिए। भावावेश मेवाड़ी सेना ने पहाड़ों से उतर कर हल्दीघाटी का युद्ध किया। हल्दीघाटी युद्ध उक्त दोनों नीतियों का मिश्रण था। वह खुला युद्ध भी था जिसमें प्रताप व उसके योद्धाओं ने अपने शौर्य व पराक्रम का प्रदर्शन किया था तथा शत्रुओं के पर्वतीय घाटी के मुंह तक आ जाने पर पर्वतीय क्षेत्र से निकल कर शत्रुओं से दो-दो हाथ कर तीव्र गति से पुनः पर्वतीय क्षेत्र में लौट जाना युद्ध प्रणाली का अंग था।

हल्दीघाटी युद्ध के परिणाम :

हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की नहीं वरन् महाराणा प्रताप की विजय हुई। यह दावा राजस्थान सरकार द्वारा किया गया है। इसके पीछे सरकार ने राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में उदयपुर में मीरा महाविद्यालय के प्रो. इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर शर्मा के शोध का हवाला दिया है।

उनके अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्रपत्र के रूप में जारी किये गए थे। जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार केवल राजा का था। 13 अक्टूबर, 1576 ई. को अकबर स्वयं भी गोगुन्दा आया। इस युद्ध में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय को माना है।

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हल्दीघाटी का युद्ध FAQ

Q 1. हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ था?

Ans – हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून, 1576 ई. को हुआ था.

Q 2. हल्दीघाटी का युद्ध किन-किन के मध्य हुआ था?

Ans – हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप व अकबर की सेना के मध्य हुआ था.

Q 3. हल्दीघाटी का युद्ध कहाँ हुआ था?

Ans – हल्दीघाटी का युद्ध हल्दीघाटी, राजसमंद में हुआ था.

Q 4. इस युद्ध को सबसे पहले किसने “हल्दीघाटी का युद्ध” कहा था?

Ans – इस युद्ध को सबसे पहले ‘जेम्स टॉड’ ने हल्दीघाटी का युद्ध कहा था.

Q 5. चेतक की समाधी कहाँ स्थित है?

Ans – चेतक की समाधी बलीचा नामक स्थान पर स्थित है.

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