औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब की राजपूत नीति | औरंगजेब के समय को ‘राजपूत-मुगल सहयोग का अवसान काल’ कहते हैं। औरंगजेब के समय में बीकानेर के राव कर्णसिंह ने निरंतर विद्रोही रवैया अपनाया

औरंगजेब की राजपूत नीति

औरंगजेब के समय को ‘राजपूत-मुगल सहयोग का अवसान काल’ कहते हैं। औरंगजेब के समय में बीकानेर के राव कर्णसिंह ने निरंतर विद्रोही रवैया अपनाया, जिससे औरंगजेब ने रुष्ट होकर राव कर्णसिंह के पुत्र अनूपसिंह को, जिसकी अपनी पिता से अनबन बीकानेर का राव (सितंबर, 1667) बना दिया।

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जोधपुर के शासक जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद नागौर के शासक इन्द्रसिंह की ओर अपना झुकाव बनाकर जसवंतसिंह के पुत्र अजीतसिंह और उसके सहयोगियों को नष्ट करने की नीति अपनाई। औरंगजेब ने अजीतसिंह की बजाय को जोधपुर के लिए टीका भेजा। जिसका सभी राठौड़ों ने दुर्गादास के नेतृत्व में पुरजोर विरोध किया। इससे मुगल-मारवाड़ संघर्ष (तीस वर्षीय युद्ध) की शुरुआत हुई। जिसका अन्त औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) पर हुआ। कोटा महाराव किशोरसिंह के उत्तराधिकारी रामसिंह को ‘राव’ की उपाधि देकर यह स्पष्ट किया कि सम्राट की इच्छा सर्वोपरि है।

यह उल्लेखनीय है कि अकबर के काल में हिन्दू मनसबदारों का मुगल प्रशासन में हिस्सा लगभग 22 प्रतिशत था जो जहाँगीर एवं शाहजहाँ के समय में भी 21 से 23 प्रतिशत के मध्य रहा। औरंगजेब ने कट्टर मुसलमान होते हुए भी अपनी मनसबदारी व्यवस्था में हिन्दू मनसबदारों की संख्या बढ़ाकर 33 प्रतिशत कर दी जो सभी मुगल शासकों में सर्वाधिक थी। इन हिन्दू मनसबदारों में मुख्यतः राजपूत और मराठा सम्मिलित थे।

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औरंगजेब की राजपूत नीति FAQ

Q 1. औरंगजेब के समय को कौनसा काल कहते हैं?

Ans – औरंगजेब के समय को ‘राजपूत-मुगल सहयोग का अवसान काल’ कहते हैं।

Q 2. मुगल-मारवाड़ संघर्ष (तीस वर्षीय युद्ध) का अंत कब हुआ था?

Ans – मुगल-मारवाड़ संघर्ष (तीस वर्षीय युद्ध) का अंत औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) पर हुआ था.

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